गए क्यूँ

गए क्यूँ

तू फिर चली गई।

मुझसे बैर क्या रहा, ये तो कह जाती।

जो रास्ते कूचे महफ़िलें मंज़र सोचे थे साथ देखने को...

वो अधूरा वादा तो पूरा कर जाती।


और उन अनगिनत बातों का क्या? जो रोज़ लिखीं

पर तुझे भेजी नहीं।

उन बहुत से किस्सों का क्या? जो ज़बाँ पर थे

पर तुझसे कह न सके।


मुझे धूल धूप हवा में, हर ज़र्रे में,

तू ही तू दिखे है।

जाते जाते अपने होठों से मेरी दवा तो कर जाती।


तुझे किसी और के पहलू में देख कर ख़ून सूख  जाएगा।

मुरझा जाएंगे हम।

तेरी जवानी बस मेरी रहे, मेरे लिए रहे।

इसी आरज़ू में... मेरा ख़रीदा ही सही, 

आख़िरी वो जाम तो पी जाती।


ये ग़लत ग़लत है...हर बार का हो गया है।

हम दिल से दिल लगातें हैं और दिलबर,

हसरतों में छोड़ निकल जाते हैं।


क्या ख़ाक जिये हम।

आंसुओ का हिसाब करें, तो झेलम भर जाए।

शराब में डूबे इतना, की अब तो नशे को खुद हम चढ़ जाएं।


सही सही तो ये हो... की अनन्त से भी आगे के सफ़र में,

हम कहकशां बेछाये बैठें 

और तू हमारी रसोई से दो प्याली प्यार भर लाती।


मेरा सर अपनी गोद में दे। ज़ुल्फ़ों से मेरा आसमां कर दे...

न सही सोज़-ओ-साज़ की समझ तुझे,

मेरी नींद को आते आते, दो गीत ही कह जाती।


मेरे ज़िंदा रहते क्यूं गई,

जाना भी था अग़र, कुछ देर बाद चली जाती।


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