दो फ़लसफ़ी
(the two artists, philosophers, creators)
दो तरह के फ़लसफ़ी मिले मुझे जहां में 'अनन्त'।
पहले वो,
जिन्होंने एक रात न देखी;
फिर दिन में, रात की बात कर तमाशा किया करते।
दूजे वो,
जो रातों जागे;
और दिन में, उजाले का खेल दिखाते।
दोनों का कहना दरसल वही।
की रात ही रात है ज़माने में;
अपना फ़लसफ़ा, आख़िर हम बदल कैसे दें।
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