तड़ीपार
तड़ीपार
मुझे धोखेबाज़ कहकर के मुल्क़ से निकाला गया...
मुजरिम बनाकर के सज़ा ए मौत भी दे दी।
ताने दिये गए
छींटा कसी हुई
पत्थर उठाकर के सीधा चेहरे पे मारा।
कहने वाले, कहकर के चले गए अपने काम...
रोने वाले, रोकर के दूजों की बाहों में सो गए...
दो दिन मुनासिब ना समझा ठहरना...
भरकर के सांस सीधा आंखों में थूका।
मन ने भी खुदको ही ख़ूब कचोटा...
लोगों ने भी एक ना सुनी दीवाने की
जाने वाले, जाकर के हँसी ख़ुशी हो गए...
हँसने वाले, हँसकर के बेसुध निकल गए...
पैने नाखूनों से सीधा दिल ही को नोचा
मुजरिम भी मैं था...
घर भी मेरा लुट गया।
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