बस इक बात

बस इक बात

                               

 

कहला भेजूं  या खुद आ जाऊं


तेरी तस्वीरों से हर रोज़ तेरा हाल पूछते हैँ,

पर तुम्हें यक़ीन कहाँ होगा।

 

कभी कभी परीशां होकर, तेरे पुराने ख़त भी पढ़ते हैं,

पर तुम्हें यक़ीन कहाँ होगा।

 

हारकर कभी तेरे सीने से लग जाना चाहते हैं हम।

तुझे बाहों में कसकर तेरे साथ सो जाना चाहते हैं।

 

किसी दिन यूं ही बस, सुबहा सुबहा तेरा फिर इंतेज़ार करना चाहते हैं।

या किसी सुबहा तु जब दरवाजे से बाहर आए,

तो पहले तेरी मुस्कान बनें फिर तेरा पूरा दिन बन जाएं।

 

फिर से तेरा हाथ पकड़ सड़क के बीचों-बीच दौड़ना चाहते हैँ।

चेहरे पर गिरते बालों को तेरे जूड़े में बांधकर, लटों को कानों के पीछे डाल देना चाहते हैं।

 

इस तरह तेरा चेहरा पूरा देख सकेंगें,

बिना किसी परदे।

 

तेरी हँसी देखना चाहते हैं हम।

 

कहला भेजूं या दौड़कर खुद आ जाऊं?

पीछे से तुझे आवाज़ लगाऊं और तेरे मुढ़ने से पहले तुझे आगोश में भर लूं,

तेरे कानों में कुछ कह जाऊं।


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