नायक

नायक


मेरी खिडकी से वो नायक नज़र आता है। 

पर सबकी निगाह से ओझल नज़र आता है।

चिठ्ठियां पहुंचती हैं पते पर उसके,

पर उसका पता, पता नहीं  पडता।


पंछियों से पहले सुबहा है उसकी, सडकों की धूल से यारी है।

हर अक्षर से बात नहीं पर,

काग़ज़ क़लम पे भारी है।


बाग़ों में फिरा करता है, खुशबूओं में रहा करता है,

चेहरे पर अपने खाक़ लगाकर,

मेले लूटा करता है।


उसकी ख़ैर है अनजानी कोई मुस्कान,

मांओ के दिलों में है, उसका मकान।


अपनी भूख ना देखकर, औरों के फ़लसफ़े देखता है।

 केंचुए सी धीमी चाल में,

सरपट सरपट रेंगता है। 


बुझे दिलों को रोशनी है, सहमें कदमों को राह है वो।

साथ में कल कल पानी जैसा,

मुसाफिरों का साह है वो।


मेरी ख़िडकी से वो नायक नज़र आता है,

गुमसुम सा चुपचाप नज़र आता है,

ख़त लिखता है खालीपन को, चुप्पी में मिलता जिसका जवाब है।

अपनों का कारवां ही खराब है इसका, दूजों के सपनों से इसका हिसाब है।


रूठने मनाने की दौड़ में उलझा, छुप-छुप कर के चलता है।

बातें अपनी भूल भी जाए, वादे पूरे करता है।


रात जो फिर से आ जाए तो, खौफ ना दिल में आने देना,

संग में चलते रहना इसके, मंज़िल घर तक आने देना।


मेरी ख़िडकी से वो नायक नज़र आता है,


तुमने देखा है क्या ?

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