कल के मोज़े उलट के पहने

कल के मोज़े उलट के पहने

(A Solace in imperfection)

 

बेफ़िक्री में कुछ यूं जिए जिंदगी


 कि जब हमसे हमारे बारे में पूछा गया...

 तो ना ब्यास मिली ना बयान। 

 

जमना से कहा यह श्वेत नहीं ,यह साफ नहीं,

 और मुझ बेवकूफ़ को आधी उम्र लगी यह समझने में

 कि धत..

स्याह तो ज़्यादा खूबसूरत था।

 

 आओ...

 मेरे बिस्तर की सलवटों में,

 कुछ सलवटें और तोड़ दो।

 मेरी रसोई के गंदे बर्तनों में,

 कुछ गंदे बर्तन और छोड़ दो।

मेरे रोशन-दान के जालों से, कुछ धूप  छन के आती है।

नहाकर बरामदे की धूल पर  भीगे पांव चलने से, 

मिट्टी की खुशबू आती है।

 

मेरे आंगन में बैठी कुर्सी,  चूं चूं में मुझसे बातें किया करती है।

आईने पर जो हैं उंगलियों के धब्बे,

 कुछ पुरानी यादों का ज़िक्र किया करते हैं।

 जो चीटियां चलती है मेरी चौखट से, उन्हें शक्कर के दाने ले जाने दो।

 मेरी दहलीज़ पर रखे पायदान को,

 कीचड़ से सन जाने दो।

कंघी में फंसे बालों के गुच्छे,

 मुझे खुद से सुलझाने दो।

 

हम बेफ़िक्री में कुछ ऐसे जिए,

कि दास्तान कहना भूल गए।

गंगा नहाने आए,

 पर मैले कपड़े लाना भूल गए।

  

 ऐसी वक्त से बाज़ी लगाई,

 के आंगन में झाड़ू तक नहीं दी मैंने,

 इस क़द्र उम्र में मशगूल हुए की,

कल के मोज़े। उलट के पहने।

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