काश्मीर
काश्मीर
चल चलूंगा लाहौर से मैं,
तू शिमले से उड़ी आना
काश्मीर में मिलेंगें।
सुना है जंग वहाँ अब मुका दि गई है,
और Democracy फ़ना हुई है।
सबका हक़ है जी
समझ का फ़र्क़ है जी,
प्यार जताने में,
कोई छोड़ देने को परवाह कहता है
कोई थामे रखने को।
सुना है घाटी में शांति है
पर क्या तू भी यही मानती है?
क्या है ये ख़ामोशी?
तूफ़ान से पहले की सरगोशी!
क्या काश्मीर में मिलना अब ठीक होगा?
लाहौरी हिंदुओं को वो हिन्दू मानेंगे,
ये मैं तो नहीं मानता।
वैसे घाटी में अब, 'लाल फूल' ज़्यादा नज़र आएंगे
पर वहां मिलना अब शायद ठीक नहीं।
मेरे घर के पास एक बड़ी मस्जिद है,
तू नमाज़ वहाँ पढ़ लेना।
पर अफ़सोस,
लड़कियों का उसमें जाना, आज भी मना है।
सुना है मुल्क़ फिर तक़सीम होने वाले हैं।
तो मैं लाहौर ही रुकता हूँ फ़िलहाल,
तू शिमले ही रह जा
किसी और दिन मिलते हैं।
किसी और जगह।
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