घाट
घाट
जे पेट नही जे कुओ है,
जे आग है सब ए निगल जावे।
जलत हमेसा धीमी सी, धीमी सी, धीमी सी।
जब जरे सो मानस ए खा जावे।
कहत निरआखर सुनो भई लोगों
जे खुसबू घाट पे मिट्टी की, मिट्टी की।
जे ख़ून में थोड़ी लिपटी सी, लिपटी सी।
जिसे घाट ने जीवन देनो थो,
वाने मौत के घाट उतारो है।
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