घर

घर


ईक ज़मीं ख़रीद लें..

तुम और हम।

और फिर उस ज़मीन पर मनचाही राह चलें, 

फिर उस ज़मीं पर एक छोटा से बड़ा घर बने।


मैंने आसमां पर चढ़कर देखा, तो टिमटिमाते तारे से नज़र आया, 

आशियाँ तेरा मेरा।

मैं फिर आसमाँ पर उतर आया, जहाँ तू मिला,

वहीं मैंने ख़ुदा पाया।


इस घर के दरीचों में, खिड़कियां नहीं लगाएंगे।

रात में ठंडी हवा की महक लेंगे।


इस घर में हिन्दू नहीं रहेंगे, 

ना सीख मुसलमां यहूदी या ईसाई।

हम रहेंगे, और वो जो सिर्फ़ इंसान की ज़ात हैं।


मैं कुछ मुसलमां हो जाऊंगा और तुम कुछ हिन्दू हो जाना।

साथ में रहकर, मैं कुछ तुम सा और तुम मुझ सी हो जाना।


इस घर को कुछ ऐसे सजाएंगे,

की बरसातें सीधा हम तक पहुंचें....

बुनियादें ऐसी रखेंगे 

की तूफ़ां कोई हिला न सके।


दोपहर में....

छांव सारी तुम रख लेना,

धूप मैं ले लूंगा।

फिर सारी धूप समेट कर, आँगन में बिखेर दूंगा।


बाग़ीचे में कहीं पैर तेरे मेरे,

जड़ बनकर धंसने न लगें!


चलो...

फिर एक नई ज़मीं ख़रीद लें... 

तुम और हम।

फिर उस ज़मीं पर 

मनचाही राह चलें



फिर उस ज़मीं पर

एक छोटा सा बड़ा घर बने।

Comments

Popular posts from this blog

गए क्यूँ

दो फ़लसफ़ी

Side B