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ताना शाह

ताना शाह मुझे एक जान, फ़रमान एक तूने जारी किया मुझे काटा बाटा लूटा तूने; दमड़ी तक को बदल डाला, चमड़ी तक को नहीं छोड़ा तू नहीं जाना, ताना शाह मैं एक नहीं, मैं एक अरब हूं। मेरे बचपन की याद को बदल डाला, मेरे शहर के नाम तक को नहीं छोड़ा हम भूखे बेबसों को धर्म के नाम पर तोड़ा एक एक दाने को, रसोई को, खाने को, कपड़ों तक को बाटा; मैं नादान सही, पर कायर नहीं नकाब के पीछे छिपता नहीं; लाश नहीं हूं, चुप था बस ख़ामोश रहा मैं, पर अब बस; मुरख है तू जो तू नहीं जाना, ताना शाह तू सोच रहा, ये एक अकेला है मैं एक नहीं, मैं एक अरब हूं। तू हस रहा जिनकी आड़ में, तेरे पीछे जो सोए हैं, सोच अगर वो जाग गए तब किधर को भागेगा; इंकलाब जब जागेगा, तब तू एक रह जाएगा मैं हर तरफ़ से आऊंगा, मैं एक अरब  हो जाऊंगा। इतिहास दोहराने वाले, तू बाज़ कहां आएगा; मेरा शहर जलाने वाले, सुन तू मुंह की खाएगा। तुझसे क्या डरूं मैं; तू इंसान का बच्चा, भगवान थोड़े ही है कभी सोचा भी, तुझे माफ़ करूं ऐसा भी बुरा हाल थोड़े ही है; पर हद की तूने, बाज़ी जब ज़िन्दगी मौत की हो चली तेरी लगाई आग में मरे बस मेरे लोग, ताना शाह; एक मौक़ा अब और तुझे दू...

काश्मीर

काश्मीर चल चलूंगा लाहौर से मैं, तू शिमले से उड़ी आना काश्मीर में मिलेंगें। सुना है जंग वहाँ अब मुका दि गई है, और Democracy फ़ना हुई है। सबका हक़ है जी समझ का फ़र्क़ है जी,  प्यार जताने में, कोई छोड़ देने को परवाह कहता है कोई थामे रखने को। सुना है घाटी में शांति है पर क्या तू भी यही मानती है? क्या है ये ख़ामोशी? तूफ़ान से पहले की सरगोशी! क्या काश्मीर में मिलना अब ठीक होगा? लाहौरी हिंदुओं को वो हिन्दू मानेंगे, ये मैं तो नहीं मानता। वैसे घाटी में अब, 'लाल फूल' ज़्यादा नज़र आएंगे पर वहां मिलना अब शायद ठीक नहीं। मेरे घर के पास एक बड़ी मस्जिद है, तू नमाज़ वहाँ पढ़ लेना। पर अफ़सोस,  लड़कियों का उसमें जाना, आज भी मना है। सुना है मुल्क़ फिर तक़सीम होने वाले हैं। तो मैं लाहौर ही रुकता हूँ फ़िलहाल, तू शिमले ही रह जा किसी और दिन मिलते हैं। किसी और जगह।

Side B

Side B कैसेट फिरा कर आज दूजी बात पहले सुनकर के देखी। बड़ा मुश्किल रहा, दूसरा पहलू सुनना। शायद पहली बात मेरी थी, तो दूजी रास न आई। किसी तीजे की होती तो बेहतर समझ पाता। हिम्मत कर के आज सुन ही डाला, उनका भी पूरा राग।  आज घमण्ड के नाड़े को ढीला कर, ग़ुरूर के पर्दे फ़ाश किये। कुछ नया ही था ये किस्सा.... कमाल तो ये हुआ कि, ये भी सच निकला। कितना सही। मेरे सही से बिलकुल ग़लत, पर फिर भी कितना सही।  बीच इल्ज़ाम में रोककर कई सफ़ाई मैंने भी दी। कई दफ़े बातों के ऊपर बातें भी भिड़ी। कई दफ़े कैसेट पीछे मुड़ी, फिर आगे बढ़ी। पर पहलू ये भी अधूरा नहीं। पहलू वो भी पूरा नहीं। उतने ही शब्दो की माला थी, काफ़िये मिलाये भी नहीं। पर फिर भी ज़्यादा रोमानचक। और सही होकर भी पूरा सही नहीं।  या मैं ही ग़लत था।  उस बार भी.... हर बार ही।  आज सुनकर देखूँ बाक़ी सारे,  साइड-बी

दो फ़लसफ़ी

(the two artists, philosophers, creators) दो तरह के फ़लसफ़ी मिले मुझे जहां में 'अनन्त'। पहले वो,  जिन्होंने एक रात न देखी; फिर दिन में, रात की बात कर तमाशा किया करते। दूजे वो, जो रातों जागे; और दिन में, उजाले का खेल दिखाते। दोनों का कहना दरसल वही। की रात ही रात है ज़माने में; अपना फ़लसफ़ा, आख़िर हम बदल कैसे दें।

घाट

घाट जे पेट नही जे कुओ है, जे आग है सब ए निगल जावे। जलत हमेसा धीमी सी, धीमी सी, धीमी सी। जब जरे सो मानस ए खा जावे। कहत निरआखर सुनो भई लोगों जे खुसबू घाट पे मिट्टी की, मिट्टी की। जे ख़ून में थोड़ी लिपटी सी, लिपटी सी। जिसे घाट ने जीवन देनो थो, वाने मौत के घाट उतारो है।

तड़ीपार

तड़ीपार  मुझे धोखेबाज़ कहकर के मुल्क़ से निकाला गया... मुजरिम बनाकर के सज़ा ए मौत भी दे दी।   ताने दिये गए छींटा कसी हुई पत्थर उठाकर के सीधा चेहरे पे मारा।          कहने वाले, कहकर के चले गए अपने काम... रोने वाले, रोकर के दूजों की बाहों में सो गए... दो दिन मुनासिब ना समझा ठहरना... भरकर के सांस सीधा आंखों में थूका।    मन ने भी खुदको ही ख़ूब कचोटा...             लोगों ने भी एक ना सुनी दीवाने की        जाने वाले, जाकर के हँसी ख़ुशी हो गए...      हँसने वाले, हँसकर के बेसुध निकल गए...    पैने नाखूनों से सीधा दिल ही को नोचा   मुजरिम भी मैं था...           घर भी मेरा लुट गया।

Toofaan

Toofaan toofaa'n ke beecho'n -beech khada hu'n main. har taraf waaqyat ka gardaa ud raha hai kood jau n ?? ya ye mujhe banaega ya ye mujhe mitaega. kood jau'n ?? banane vale ne yu'n banaya, main kisi ke samajh na aaya anant se aage tak jo phaela ho, use bhala kaun mita paya lo phir... kood gaya