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Showing posts from May, 2020

ताना शाह

ताना शाह मुझे एक जान, फ़रमान एक तूने जारी किया मुझे काटा बाटा लूटा तूने; दमड़ी तक को बदल डाला, चमड़ी तक को नहीं छोड़ा तू नहीं जाना, ताना शाह मैं एक नहीं, मैं एक अरब हूं। मेरे बचपन की याद को बदल डाला, मेरे शहर के नाम तक को नहीं छोड़ा हम भूखे बेबसों को धर्म के नाम पर तोड़ा एक एक दाने को, रसोई को, खाने को, कपड़ों तक को बाटा; मैं नादान सही, पर कायर नहीं नकाब के पीछे छिपता नहीं; लाश नहीं हूं, चुप था बस ख़ामोश रहा मैं, पर अब बस; मुरख है तू जो तू नहीं जाना, ताना शाह तू सोच रहा, ये एक अकेला है मैं एक नहीं, मैं एक अरब हूं। तू हस रहा जिनकी आड़ में, तेरे पीछे जो सोए हैं, सोच अगर वो जाग गए तब किधर को भागेगा; इंकलाब जब जागेगा, तब तू एक रह जाएगा मैं हर तरफ़ से आऊंगा, मैं एक अरब  हो जाऊंगा। इतिहास दोहराने वाले, तू बाज़ कहां आएगा; मेरा शहर जलाने वाले, सुन तू मुंह की खाएगा। तुझसे क्या डरूं मैं; तू इंसान का बच्चा, भगवान थोड़े ही है कभी सोचा भी, तुझे माफ़ करूं ऐसा भी बुरा हाल थोड़े ही है; पर हद की तूने, बाज़ी जब ज़िन्दगी मौत की हो चली तेरी लगाई आग में मरे बस मेरे लोग, ताना शाह; एक मौक़ा अब और तुझे दू...

काश्मीर

काश्मीर चल चलूंगा लाहौर से मैं, तू शिमले से उड़ी आना काश्मीर में मिलेंगें। सुना है जंग वहाँ अब मुका दि गई है, और Democracy फ़ना हुई है। सबका हक़ है जी समझ का फ़र्क़ है जी,  प्यार जताने में, कोई छोड़ देने को परवाह कहता है कोई थामे रखने को। सुना है घाटी में शांति है पर क्या तू भी यही मानती है? क्या है ये ख़ामोशी? तूफ़ान से पहले की सरगोशी! क्या काश्मीर में मिलना अब ठीक होगा? लाहौरी हिंदुओं को वो हिन्दू मानेंगे, ये मैं तो नहीं मानता। वैसे घाटी में अब, 'लाल फूल' ज़्यादा नज़र आएंगे पर वहां मिलना अब शायद ठीक नहीं। मेरे घर के पास एक बड़ी मस्जिद है, तू नमाज़ वहाँ पढ़ लेना। पर अफ़सोस,  लड़कियों का उसमें जाना, आज भी मना है। सुना है मुल्क़ फिर तक़सीम होने वाले हैं। तो मैं लाहौर ही रुकता हूँ फ़िलहाल, तू शिमले ही रह जा किसी और दिन मिलते हैं। किसी और जगह।

Side B

Side B कैसेट फिरा कर आज दूजी बात पहले सुनकर के देखी। बड़ा मुश्किल रहा, दूसरा पहलू सुनना। शायद पहली बात मेरी थी, तो दूजी रास न आई। किसी तीजे की होती तो बेहतर समझ पाता। हिम्मत कर के आज सुन ही डाला, उनका भी पूरा राग।  आज घमण्ड के नाड़े को ढीला कर, ग़ुरूर के पर्दे फ़ाश किये। कुछ नया ही था ये किस्सा.... कमाल तो ये हुआ कि, ये भी सच निकला। कितना सही। मेरे सही से बिलकुल ग़लत, पर फिर भी कितना सही।  बीच इल्ज़ाम में रोककर कई सफ़ाई मैंने भी दी। कई दफ़े बातों के ऊपर बातें भी भिड़ी। कई दफ़े कैसेट पीछे मुड़ी, फिर आगे बढ़ी। पर पहलू ये भी अधूरा नहीं। पहलू वो भी पूरा नहीं। उतने ही शब्दो की माला थी, काफ़िये मिलाये भी नहीं। पर फिर भी ज़्यादा रोमानचक। और सही होकर भी पूरा सही नहीं।  या मैं ही ग़लत था।  उस बार भी.... हर बार ही।  आज सुनकर देखूँ बाक़ी सारे,  साइड-बी

दो फ़लसफ़ी

(the two artists, philosophers, creators) दो तरह के फ़लसफ़ी मिले मुझे जहां में 'अनन्त'। पहले वो,  जिन्होंने एक रात न देखी; फिर दिन में, रात की बात कर तमाशा किया करते। दूजे वो, जो रातों जागे; और दिन में, उजाले का खेल दिखाते। दोनों का कहना दरसल वही। की रात ही रात है ज़माने में; अपना फ़लसफ़ा, आख़िर हम बदल कैसे दें।

घाट

घाट जे पेट नही जे कुओ है, जे आग है सब ए निगल जावे। जलत हमेसा धीमी सी, धीमी सी, धीमी सी। जब जरे सो मानस ए खा जावे। कहत निरआखर सुनो भई लोगों जे खुसबू घाट पे मिट्टी की, मिट्टी की। जे ख़ून में थोड़ी लिपटी सी, लिपटी सी। जिसे घाट ने जीवन देनो थो, वाने मौत के घाट उतारो है।

तड़ीपार

तड़ीपार  मुझे धोखेबाज़ कहकर के मुल्क़ से निकाला गया... मुजरिम बनाकर के सज़ा ए मौत भी दे दी।   ताने दिये गए छींटा कसी हुई पत्थर उठाकर के सीधा चेहरे पे मारा।          कहने वाले, कहकर के चले गए अपने काम... रोने वाले, रोकर के दूजों की बाहों में सो गए... दो दिन मुनासिब ना समझा ठहरना... भरकर के सांस सीधा आंखों में थूका।    मन ने भी खुदको ही ख़ूब कचोटा...             लोगों ने भी एक ना सुनी दीवाने की        जाने वाले, जाकर के हँसी ख़ुशी हो गए...      हँसने वाले, हँसकर के बेसुध निकल गए...    पैने नाखूनों से सीधा दिल ही को नोचा   मुजरिम भी मैं था...           घर भी मेरा लुट गया।

Toofaan

Toofaan toofaa'n ke beecho'n -beech khada hu'n main. har taraf waaqyat ka gardaa ud raha hai kood jau n ?? ya ye mujhe banaega ya ye mujhe mitaega. kood jau'n ?? banane vale ne yu'n banaya, main kisi ke samajh na aaya anant se aage tak jo phaela ho, use bhala kaun mita paya lo phir... kood gaya

Aag aur hawaa

Aag aur hawaa tere jho'nke se phaphak kar. khil si uthti hai. meri lau to varna dhimi, chup si chamakti hai. meri fitrat hi hai shayad jalte rehne ki... varna, sabaa ke chhune se bhala kabhi 'AAH' nikalti hai. faasle pe hu'n, roshan ho isiliye, mere seene me dekho ik aanch si jalti hai.

आतिश

आतिश एक आतिश तो पल भर का है, उसकी क्या बिसात बस एक पल को रोशन है, फिर इक पल में रात  फिर क्यों इतने गीत करोड़ों, हर दिन गाए जाते हैं  चुपचाप जो गुमसुम बैठे थे सारे दीपक खिल जाते हैं सागर चाहे हो बहुत बड़ा  पर तनहा ही रह जाता है आतिश दरियादिल पल भर में रोशन दुनिया कर जाता है

The shore sisters

The shore sisters The stone floats near the brim, in the cup of the sea. And seagulls try to pick it away… But sometimes the stones are li’l too heavy to lift. for a li’l li’l seagull… And the soaked rocks are li’l too heavy to lift. For an alone li’l baby girl. For the rocks of peers. And the blocks of pressure. The Tiny marbles of daily-hood and the enormous mountains of life-hood. Are way too heavy to lift for a lone li’l bird.   She needs a fellow feathery friend sometimes She needs a chuckling chum by her sides. Sometimes.  So together we may take the straws to the farther end. Together we may  build the nest in the hollow forest. And with the power of the great gusty winds. I say. We will.

नायक

नायक मेरी खिडकी से वो नायक नज़र आता है।  पर सबकी निगाह से ओझल नज़र आता है। चिठ्ठियां पहुंचती हैं पते पर उसके, पर उसका पता, पता नहीं  पडता। पंछियों से पहले सुबहा है उसकी, सडकों की धूल से यारी है। हर अक्षर से बात नहीं पर, काग़ज़ क़लम पे भारी है। बाग़ों में फिरा करता है, खुशबूओं में रहा करता है, चेहरे पर अपने खाक़ लगाकर, मेले लूटा करता है। उसकी ख़ैर है अनजानी कोई मुस्कान, मांओ के दिलों में है, उसका मकान। अपनी भूख ना देखकर, औरों के फ़लसफ़े देखता है।  केंचुए सी धीमी चाल में, सरपट सरपट रेंगता है।  बुझे दिलों को रोशनी है, सहमें कदमों को राह है वो। साथ में कल कल पानी जैसा, मुसाफिरों का साह है वो। मेरी ख़िडकी से वो नायक नज़र आता है, गुमसुम सा चुपचाप नज़र आता है, ख़त लिखता है खालीपन को, चुप्पी में मिलता जिसका जवाब है। अपनों का कारवां ही खराब है इसका, दूजों के सपनों से इसका हिसाब है। रूठने मनाने की दौड़ में उलझा, छुप-छुप कर के चलता है। बातें अपनी भूल भी जाए, वादे पूरे करता है। रात जो फिर से आ जाए तो, खौफ ना दिल में आने देना, संग में चलते रहना इसके, मंज़िल घर तक आने देना। मेरी ख़िडकी से वो नायक...

गए क्यूँ

गए क्यूँ तू फिर चली गई। मुझसे बैर क्या रहा, ये तो कह जाती। जो रास्ते कूचे महफ़िलें मंज़र सोचे थे साथ देखने को... वो अधूरा वादा तो पूरा कर जाती। और उन अनगिनत बातों का क्या? जो रोज़ लिखीं पर तुझे भेजी नहीं। उन बहुत से किस्सों का क्या? जो ज़बाँ पर थे पर तुझसे कह न सके। मुझे धूल धूप हवा में, हर ज़र्रे में, तू ही तू दिखे है। जाते जाते अपने होठों से मेरी दवा तो कर जाती। तुझे किसी और के पहलू में देख कर ख़ून सूख  जाएगा। मुरझा जाएंगे हम। तेरी जवानी बस मेरी रहे, मेरे लिए रहे। इसी आरज़ू में... मेरा ख़रीदा ही सही,  आख़िरी वो जाम तो पी जाती। ये ग़लत ग़लत है...हर बार का हो गया है। हम दिल से दिल लगातें हैं और दिलबर, हसरतों में छोड़ निकल जाते हैं। क्या ख़ाक जिये हम। आंसुओ का हिसाब करें, तो झेलम भर जाए। शराब में डूबे इतना, की अब तो नशे को खुद हम चढ़ जाएं। सही सही तो ये हो... की अनन्त से भी आगे के सफ़र में, हम कहकशां बेछाये बैठें  और तू हमारी रसोई से दो प्याली प्यार भर लाती। मेरा सर अपनी गोद में दे। ज़ुल्फ़ों से मेरा आसमां कर दे... न सही सोज़-ओ-साज़ की समझ तुझे, मेरी नींद को आते आते, दो गीत ही कह जाती। मेरे ...

घर

घर ईक ज़मीं ख़रीद लें.. तुम और हम। और फिर उस ज़मीन पर मनचाही राह चलें,  फिर उस ज़मीं पर एक छोटा से बड़ा घर बने। मैंने आसमां पर चढ़कर देखा, तो टिमटिमाते तारे से नज़र आया,  आशियाँ तेरा मेरा। मैं फिर आसमाँ पर उतर आया, जहाँ तू मिला, वहीं मैंने ख़ुदा पाया। इस घर के दरीचों में, खिड़कियां नहीं लगाएंगे। रात में ठंडी हवा की महक लेंगे। इस घर में हिन्दू नहीं रहेंगे,  ना सीख मुसलमां यहूदी या ईसाई। हम रहेंगे, और वो जो सिर्फ़ इंसान की ज़ात हैं। मैं कुछ मुसलमां हो जाऊंगा और तुम कुछ हिन्दू हो जाना। साथ में रहकर, मैं कुछ तुम सा और तुम मुझ सी हो जाना। इस घर को कुछ ऐसे सजाएंगे, की बरसातें सीधा हम तक पहुंचें.... बुनियादें ऐसी रखेंगे  की तूफ़ां कोई हिला न सके। दोपहर में.... छांव सारी तुम रख लेना, धूप मैं ले लूंगा। फिर सारी धूप समेट कर, आँगन में बिखेर दूंगा। बाग़ीचे में कहीं पैर तेरे मेरे, जड़ बनकर धंसने न लगें! चलो... फिर एक नई ज़मीं ख़रीद लें...  तुम और हम। फिर उस ज़मीं पर  मनचाही राह चलें फिर उस ज़मीं पर एक छोटा सा बड़ा घर बने।

कल के मोज़े उलट के पहने

कल के मोज़े उलट के पहने (A Solace in imperfection)   बेफ़िक्री में कुछ यूं जिए जिंदगी  कि जब हमसे हमारे बारे में पूछा गया...  तो ना ब्यास मिली ना बयान।    जमना से कहा यह श्वेत नहीं ,यह साफ नहीं,  और मुझ बेवकूफ़ को आधी उम्र लगी यह समझने में  कि धत.. स्याह तो ज़्यादा खूबसूरत था।    आओ...  मेरे बिस्तर की सलवटों में,  कुछ सलवटें और तोड़ दो।  मेरी रसोई के गंदे बर्तनों में,  कुछ गंदे बर्तन और छोड़ दो। मेरे रोशन-दान के जालों से, कुछ धूप  छन के आती है। नहाकर बरामदे की धूल पर  भीगे पांव चलने से,  मिट्टी की खुशबू आती है।   मेरे आंगन में बैठी कुर्सी,  चूं चूं में मुझसे बातें किया करती है। आईने पर जो हैं उंगलियों के धब्बे,  कुछ पुरानी यादों का ज़िक्र किया करते हैं।  जो चीटियां चलती है मेरी चौखट से, उन्हें शक्कर के दाने ले जाने दो।  मेरी दहलीज़ पर रखे पायदान को,  कीचड़ से सन जाने दो। कंघी में फंसे बालों के गुच्छे,  मुझे खुद से सुलझाने दो।   हम बेफ़िक्री में कुछ ऐसे जिए, कि दास्तान कहना...